मैं था एक पौधा
बारिश की बूंदे
सूरज की रोशनी
और थी बहती हवा
पंछी मुझे गीत सुनाते
बारिश मुझको नहलाती
मुझको सहलाती थी हवा
मैं था एक पौधा
प्यारी सी ज़िन्दगी थी
सुकूं से था में खड़ा
जड़ें हुई मेरी गहरी
आसमां की ओर मैं बढ़ा
क्या गलती थी मेरी
किया ऐसा क्या पाप
कि तुम लोगों ने मुझको
दिया जड़ से ही काट
काट डाला मुझे क्यों
काट डाला मुझे क्यों
क्यों ?क्यों ?क्यों ?
क्या मैं था बस एक पौधा .......
बारिश की बूंदे
सूरज की रोशनी
और थी बहती हवा
पंछी मुझे गीत सुनाते
बारिश मुझको नहलाती
मुझको सहलाती थी हवा
मैं था एक पौधा
प्यारी सी ज़िन्दगी थी
सुकूं से था में खड़ा
जड़ें हुई मेरी गहरी
आसमां की ओर मैं बढ़ा
क्या गलती थी मेरी
किया ऐसा क्या पाप
कि तुम लोगों ने मुझको
दिया जड़ से ही काट
काट डाला मुझे क्यों
काट डाला मुझे क्यों
क्यों ?क्यों ?क्यों ?
क्या मैं था बस एक पौधा .......

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