ओस कणों से भरा हुआ यह नवल प्रभात
शीतलता मिलती वटपों के छूकर शीतल गात
शीतलता मिलती वटपों के छूकर शीतल गात
ज्यों ही निकला अरुण लिए रश्मियों का साथ
चलने लगी पवन शीतल हिले वनों के पात
हिले वनों के पात मानो हिले हों हाथ
चलने लगी पवन शीतल हिले वनों के पात
हिले वनों के पात मानो हिले हों हाथ
करने स्वागत अरुण का करने रश्मियों से बात
ओस कणों से टकराई रश्मियों की रेखा
मानो सूरज ने ऊषा के नयनों में हो देखा
लगता रक्तिम सरिताओं का जल इस पल
मानो हो सिंदूर प्रकृति का यह रक्तिम जल
नभ में करने लगे कोलाहल खगों के दल
सूरज की किरणें मानो जीवन का आँचल
खिले कमल होने लगा भ्रमरों का विलास
खुली आँखें खुलने लगे आलस के पाश
संग प्रकृति के मिलेंगे ऐसे कोटि कोटि सपने
संग प्रकृति के मिलेंगे ऐसे कोटि कोटि सपने
रसपान करेंगी जब आंखें सब होंगे अपने .......

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